संबोधि

स्वाध्याय

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आचार्य महाप्रज्ञ

क्रिया-अक्रियावाद


(23) आगारमावसंल्लोक:, सर्वप्राणेषु संयत:।
समतां सुव्रतो गच्छन्, स्वर्गं गच्छति नाऽमृतम्॥

घर में निवास करने वाला व्यक्‍ति सब प्राणियों के प्रति स्थूल रूप से संयत होता है। जो सुव्रत है और समभाव की आराधना करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त होता है, किंतु हिंसा और परिग्रह के बंधन से सर्वथा मुक्‍त न होने के कारण वह मोक्ष को नहीं पा सकता।

जीवों की विविध योनियाँ हैं। उसमें मानव-जीवन सर्वश्रेष्ठ है। समस्त अध्यात्मद्रष्टा संतों ने एक स्वर से इस सत्य को स्वीकार किया है। मानवीय जीवन से नीचे स्तर के प्राणियों में विवेक की मात्रा इतनी विकसित नहीं है जितनी कि मनुष्य में। मनुष्य-जीवन द्वार है जिससे वह नीचे और ऊपर दोनों तरफ गति कर सकता है। नीचे और ऊपर जाने का स्वातंत्र्य भी उसके हाथ में है। निर्णय यह करना है कि जाना कहाँ है? अनेक व्यक्‍ति जीवन की परिसमाप्ति तक निर्णय नहीं कर पाते। ये सरिता के प्रवाह में लुढ़कते हुए पत्थरों की तरह हैं। कर्म के प्रवाह में प्रवाहित होते हुए आए और वैसे ही चले गए। किंतु जीवन उन्हीं के लिए है जो ऊपर उठने का निर्णय लेते हैं और उस दिशा में अनवरत गतिशील रहते हैं।
मूल स्थिति मनुष्य जीवन है। मानव देह से पुन: मानव देह धारण करना, यह भी इतना सहज नहीं है। इसका सौभाग्य
भी किसी-किसी को उपलब्ध होता है। अनेक लोग हैं और उनकी जीवन-पद्धतियाँसंस्कार भी पृथक्-पृथक् हैं। सत्य क्या
है? अनेक लोगों से यह अविज्ञात है, तब फिर उसके साक्षात्कार की कल्पना तो कर ही नहीं सकते। आगम कहते हैंमूल स्थिति उनके लिए पुन:शक्य हैजो सरल, विनम्र, शांत और निश्छल व्यवहार युक्‍त हैं। मूूल-स्थिति से उत्थान का क्रम हैइंद्रियों और मन का प्रत्याहार करना। उनके बहिर्गामी दौड़ को अंतर्गामी बनाना। मन को बिना एकाग्र किए और उसके स्वरूप से परिचित हुए बिना उसका नियमन कठिनतम है। संयत मन और संयत इंद्रियाँ आत्म-दर्शन का द्वार उद्घाटित
करती हैं। इनके द्वारा क्रमश: आरोहण के सोपानों का अतिक्रमण करते हुए व्यक्‍ति उच्च, उच्चतर और उच्चतम अवस्थिति को पा लेता है।

(24) दु:खावह इहाऽमुत्र, धनादीनां परिग्रह:।
मुमुक्षु: स्वं दिद‍ृक्षुश्‍च को विद्वान् गृहमावसेत्॥

धन आदि पदार्थों का संग्रह इहलोक और परलोक में दु:खदायी होता है। अत: मुक्‍त होने की इच्छा रखने वाला और आत्म-साक्षात्कार की भावना रखने वाला कौन ऐसा विद्वान् व्यक्‍ति होगा जो घर में रहे?

गृहस्थ-जीवन क्लेशों से भरा है और संयम जीवन क्लेशों से मुक्‍त है। मनुष्य शांतिप्रिय है किंतु वह शांति का दर्शन संयम में न करके असंयम में करता है। असंयम शांति का द्वार नहीं, अशांति का द्वार है। जो शांतिप्रिय है उसे संयम प्रिय होना चाहिए। वस्तुत: जिसे शांति प्रिय है वह धन, पुत्र आदि में उसे नहीं देखता। वह उनसे संपृक्‍त रहता हुआ भी धायमाता की तरह उन्हें अपना नहीं मानता।