यह म्यूजियम नई पीढ़ी के लिए ज्ञान का माध्यम बन सकता है: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

यह म्यूजियम नई पीढ़ी के लिए ज्ञान का माध्यम बन सकता है: आचार्यश्री महाश्रमण

अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस ‘महाप्रज्ञ दर्शन’ (म्यूजियम) का भव्य लोकार्पण

सरदारशहर, 8 मई, 2022
सरदारशहर में स्थित हमारे दशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी का समाधि स्थल-अध्यात्म का शांतिपीठ। महासभा द्वारा वहाँ पर महाप्रज्ञ दर्शन म्यूजियम बनाया गया है। इस म्यूजियम का लोकार्पण परम पावन के चरण स्पर्श व मंगलपाठ से हुआ। आचार्य महाप्रज्ञजी के पट्टधर आचार्यश्री महाश्रमण जी आज प्रातः लगभग 6ः40 पर तेरापंथ भवन से विहार कर आचार्य महाप्रज्ञ समाधि स्थल पधारे। लगभग पूज्यप्रवर ने डेढ़ घंटे तक म्यूजियम का अवलोकन किया। श्रावक-श्राविका समाज की भी अच्छी उपस्थिति थी।
परम पावन ने मंगल प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि समाधि के बारे में आगम वाङ्मय में संदेश-निर्देश दिया गया है कि समाधि चार प्रकार की होती है। विनय समाधि, श्रुत समाधि, तप समाधि और आचार समाधि। शांति, परम शांति, कर्म मुक्ति रूप में परम शांति पाने के लिए आदमी को विनय का अभ्यास करना चाहिए। विनय से शांति-समाधान मिल सकता है। श्रुत-ज्ञान की आराधना से भी चित्त को समाधान-शांति मिल सकती है। जिज्ञासा का उत्तर मिलना समाधान होता है। तपस्या भी एक समाधि प्रदाता तत्त्व है। तप से शरीर व चित्त में समाधि मिलती है व कर्म निर्जरा होती है। आदमी का आचार, चारित्र, आचरण ठीक होता है, तो बड़ी समाधि मिलती है।
परमपूज्य आचार्य महाप्रज्ञजी जैन शासन के एक संप्रदाय श्वेतांबर तेरापंथ के दशम आचार्य थे। हमारे धर्मसंघ में वे सबसे बड़ी उम्र में आचार्य बनने वाले, सबसे अधिक संयम पर्याय प्राप्त करने वाले भी अतीत के दस आचार्यों में आचार्य महाप्रज्ञजी थे। सबसे अधिक आयुष्य प्राप्त करने वाले भी आचार्य महाप्रज्ञ थे। आचार्य महाप्रज्ञजी के पास ज्ञान का अच्छा विकास था। वे अनेक भाषाओं, तत्त्व के, आगमों के, विषयों के अध्येता रहे हैं। उनके व्यवहार में कितना विनय भाव था। जीवन के आठवें दशक में भी वो गुरुदेव तुलसी को बैठकर वंदना किया करते थे। वे छोटे साधु की तरह गुरु को वंदना किया करते थे।


गुरुदेव तुलसी की भी महानता थी कि अपने युवाचार्य को स्वयं का पद विसर्जन करके आचार्य बना दिया था। ये हमारे तेरापंथ धर्मसंघ की अद्वितीय घटना है। आचार्य महाप्रज्ञ जी में भी विनय समाधि थी। आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने बड़ी तपस्याएँ तो नहीं की थी, परंतु उनका खाद्य संयम था और खाद्य में विवेक भी था। अंतिम दिन तक उन्होंने प्रवचन किया था। उनका दिमाग कितना सक्रिय था, भाषा कितनी अच्छी थी। प्रवचन करना भी एक तपस्या ही है। बोलने में भी सारपूर्ण बोलना भी एक तपस्या है।
साधु का आचार तो पाँच महाव्रत, पाँच समितियाँ, तीन गुप्तियाँ होती हैं। वे तो ग्यारहवें वर्ष में भी साधु बन गए थे। आचार चारित्र भी अपने आपमें एक समाधि है। आज यहाँ वापस जल्दी ही सलक्ष्य आना हुआ है। महासभा ने मानो बुला लिया है। वैसे मैं अच्छे टाइम पर आया हूँ। षष्टीपूर्ति के मौके से पहले गुरु के समाधि स्थान पर आना हो गया। पट्टोत्सव के समय भी ऐसे ही आना हो गया था।


महाप्रज्ञ दर्शन म्यूजियम का अवलोकन किया। इसका अच्छा उपयोग हो, कुछ आकर्षण भी है। नई पीढ़ी के लिए रुचिकर हो सकता है। ज्ञान का माध्यम बन सकता है। कितनों का श्रम लगा है। अपने धर्मसंघ के स्तर पर पहली बार ये देखा है। कुछ आधुनिकता के साथ बना है। समाधि स्थल का परिसर भी अच्छा है। हमारा धर्मसंघ भी खूब चित्त समाधि में रहे। हम सब धर्मसंघ की सेवा करते हैं। खुद की साधना के साथ दूसरों की सेवा में सहयोगी बनते रहें। सरदारशहर प्रवास में भी इतने लोग बाहर से निवासी लोग आए हैं। लोगों ने मौके का लाभ उठाने का प्रयास किया है। निमित्त से मिलना हो जाता है।
म्यूजियम (महाप्रज्ञ दर्शन) लोकार्पण के अवसर पर महासभाध्यक्ष मनसुख सेठिया, मुख्य ट्रस्टी सुरेश गोयल, म्यूजियम कल्पनाकार मनीष बरड़िया, महासभा महामंत्री विनोद बैद, स्थानीय सभाध्यक्ष सिद्धार्थ चिंडालिया, सीमा मिश्रा, संपत बच्छावत ने अपनी भावना अभिव्यक्त की। पूज्यप्रवर के श्रीचरणों में जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित तेरापंथ का यशस्वी साध्वी समाज भाग-4-5 व साध्वी राजुलप्रभाजी द्वारा संकलित पुस्तक East VS West Oneirocritica लोकार्पण की गई।