महाप्रज्ञ शब्द आर्षवाणी से प्राप्त किया जाने वाला शब्द है: आचार्यश्री महाश्रमण

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महाप्रज्ञ शब्द आर्षवाणी से प्राप्त किया जाने वाला शब्द है: आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का तेरहवाँ महाप्रयाण दिवस

अध्यात्म का शांतिपीठ, 26 अप्रैल, 2022
वैशाख कृष्णा एकादशी, आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी की तेरहवीं महाप्रयाण तिथि। आज से बारह वर्ष पूर्व गोठीजी की हवेली में आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी का महाप्रयाण हुआ था। अध्यात्म का शांतिपीठ परिसर में आपश्री का दाह-संस्कार हुआ था। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के अनंतर पट्टधर तेरापंथ के एकादशम अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी प्रथम बार अपने गुरु आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की वार्षिक महाप्रयाण तिथि पर पधारे हैं। वैसे दिसंबर, 2013 में भी पधारे थे। पूज्यप्रवर समाधि स्थल पर पधारे एवं नीचे बैठकर अपने गुरु का स्मरण जप किया। शासन शेखर ने मंगल प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि आगम वाङ्मय में महाप्रज्ञ शब्द का प्राकृत रूप प्राप्त होता है। गुरुदेव तुलसी ने मुनि नथमलजी स्वामी टमकोर को महाप्रज्ञ का अलंकरण प्रदान कर उनको अलंकृत किया था। महाप्रज्ञ शब्द आर्षवाणी से प्राप्त किया जाने वाला शब्द है। महाप्रज्ञ अलंकरण था तो नामकरण भी हो गया। जब मुनि नथमलजी स्वामी टमकोर को युवाचार्य पद राजलदेसर में वि0सं0 2035 माघ शुक्ला सप्तमी को दिया गया था तब आचार्यश्री तुलसी ने महाप्रज्ञ अलंकरण को नथमल की जगह नामकरण महाप्रज्ञ कर दिया था।
महाप्रज्ञ अलंकरण दिया गया वो पहचान का ही साधन नहीं, मानो यथा नाम तथा गुण वाली बात भी थी। उनमें महान प्रज्ञा या महान ज्ञान विद्यमान भी था। आज का यह दिन आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का महाप्रयाण दिवस है। उनका लगभग 90 वर्षों का जीवन काल था। टमकोर जैसे गाँव में वे शिशु रूप में भी थे। बड़े लोग छोटे-छोटे गाँवों में भी हो सकते हैं। पता नहीं गाँवों में कौन सा रत्न कब सामने आ जाए। नथमलजी पूज्य कालूगणी के द्वारा दीक्षित हुए थे। दीक्षा प्राप्ति उनकी सरदारशहर में हुई थी। बाद में ज्ञान का विकास शुरू हुआ और वे महाप्रज्ञ बन गए। मुनि अवस्था में भी उनका विद्वान संत के रूप में नाम आता था। मुनि नथमलजी विद्वान होने के साथ-साथ एक दार्शनिक के रूप में सामने आए। वे हमारे धर्मसंघ के स्तंभ जैसे बन गए थे। आचार्य तुलसी के हर कार्य में वे सहयोगी रहा करते थे। मुनि अवस्था में उनको एक बड़ा स्थान दिया गयाµनिकाय सचिव का। बाद में उनको युवाचार्य बना दिया गया। लगभग 15 वर्ष तक वे युवाचार्य के रूप में गुरुदेव तुलसी के सहयोगी रहे। अध्यापन का कार्य भी उन्होंने शुरू किया।
मुझे भी उनकी क्लास में बैठने का मौका मिला था। कितने-कितने ग्रंथों का वाचन चलता था। एक उपाध्याय का रूप उनमें उभरता था। आगम संपादन का भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य उनके द्वारा हुआ। हमारा आगम साहित्य बहुत अच्छा है। और भी अच्छा बन जाए। परिस्कार की भी अपेक्षा है। हमारे अनेक चारित्रात्माएँ भी आगम संपादन में वर्तमान में लगे हुए हैं। सारे आगम कार्य को राष्ट्र माने तो वो राष्ट्रपति गुरुदेव तुलसी थे। प्रधानमंत्री आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी थे। आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी का ज्ञान बड़ा निर्मल था। उनमें संस्कृत-प्राकृत का अच्छा ज्ञान था। मुख्य नियोजिका जी आदि कई साध्वियाँ एवं कई मुनि भी आगम के कार्य में लगे हैं, संस्कृत का ज्ञान है, तो काम अच्छा हो सकता है। मुनि महेंद्र कुमार जी जो भगवती का कार्य कर रहे हैं, इस कार्य को प्राथमिकता देते रहें। पनावणा के कार्य को मुख्य नियोजिका जी कर रहे हैं, वो भी जल्दी सामने आ जाए। 32 आगम का कार्य हो जाए तो एक कार्य तो संपन्न हो जाए। ये आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञजी को सच्ची श्रद्धांजलि हो जाएगी। हम समाधि स्थल पर आए हुए हैं। उनके गुण हमारे में आ जाएँ तो महाप्रयाण दिवस मनाना सार्थक हो सकता है। मुख्य मुनि, साध्वीवर्या, मुनि विमल कुमार जी, मुनि जितेंद्र कुमार जी व मुनि मनन कुमार जी भी आगम कार्य में लगे हुए हैं।
पूज्यप्रवर ने आचार्यश्री के प्रति एक स्वरचित गीत का सुमधुर संगान कियाµमहाप्रज्ञ गुरु वत्सलता को स्मृति में लाएँ हम। जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित पुस्तक डल ैचतपजनंस श्रवनतदमल जो यात्रा एक अकिंचन का अंग्रेजी अनुवाद है, पूज्यप्रवर के चरणों में लोकार्पित किया गया। पूज्यप्रवर ने आशीर्वचन फरमाया। शासनसेवी श्रावक जतनमल सेठिया की जीवनी पर लिखित कृति भी उनके परिवार द्वारा श्रीचरणों में लोकार्पित की गई। पूज्यप्रवर ने आशीर्वचन फरमाए। मुख्य नियोजिका जी ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञजी बचपन में साधारण थे पर वे असाधारण बन गए थे। कालूगणी ने उस बच्चे को देखा, निहारा और अपने चरण में स्वीकार कर लिया। मुनि तुलसी को उन्हें संभला दिया। मुनि तुलसी की पाठशाला में उन्होंने बहुत कुछ सीखा। उनकी तर्क शक्ति बढ़ गई थी। वे बाहर से नहीं, भीतर से भी बदल गए थे। साध्वीवर्या जी ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञजी प्रज्ञा के धनी थे, वे प्रज्ञा-पुरुष थे। वे अज्ञ से विज्ञ और महाप्रज्ञ बन गए। उनकी प्रज्ञा के विकास में बाहरी निमित्त के अलावा निमित्त बने दो-दो गुरु। गुरु का योग शिष्य के जीवन में बहुत बड़ा काम कर जाता है। वे महायोगी व कुशल आगम संपादक थे। उन्होंने प्रेक्षाध्यान, जीवन-विज्ञान जैसे अवदान दिए जो जन-जन के लिए उपयोगी हैं। मुख्य मुनिप्रवर ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञजी सिद्ध योगी और बहुश्रुत आचार्य थे। उनका व्यक्तित्व विशेष था। उन्होंने जैन धर्म को नई पहचान दी। वे महान दर्शनिक होते हुए उनका जीवन सहजता लिए हुए था। वे निरंतर साधनारत रहते हुए भी परोपकार परायण थे। मैंने उनको माँ, शिक्षक, पिता और चिकित्सक के रूप में देखा है और महसूस भी किया है। वे ममता और प्रज्ञा के समंदर थे।


आचार्य महाप्रज्ञजी को अपनी भावांजलि प्रदान करते हुए मुनि रजनीश कुमार जी, मुनि राजकुमार जी, मुनि अनेकांतकुमार जी, साध्वी संगीतप्रभा जी, साध्वी अक्षयप्रभाजी, साध्वीवृंद समूह गीत, सरदारशहर की साध्वियाँ समुह गीत, साध्वी मुदितयशाजी, साध्वी चारित्रयशाजी, साध्वी पवित्रयशाजी ने अपनी भावना अभिव्यक्त की। समणी निर्मलप्रज्ञा जी, समणी रोहिणीप्रज्ञाजी व समणी प्रणवयशा जी ने भी अपनी भावना अभिव्यक्त की। महासभा अध्यक्ष मनसुख सेठिया, चैनरूप चिंडालिया, विनोद बैद, सुरेंद्र बोरड़, संपतमल बच्छावत, कन्या मंडल, महिला मंडल, अशोक पींचा व टमकोर के आचार्य महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल की ओर से आचार्यश्री महाप्रज्ञजी को भावांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया। रात्रि में समाधि स्थल पर धम्म जागरणा का आयोजन किया गया।