वर्धापना

वर्धापना

प्रमुदित मन से तुम्हें बधाएं
शुभ प्रसंग पर शुभ भावों से शुभं भूयात् घोष लगाएं।।

अतुलित गरिमा अतुलित आभा अतुलित प्रेरक लफ्ज तुम्हारे
बे-नजीर व्यक्तित्व तुम्हारा इक्कीसवीं सदी के ही ध्रुवतारे
महातपस्वी ध्रुवयोगी को मुक्त कंठ से आलम सारा विरूदाएं।।

तुलसी महाप्रज्ञ का तुमने युगल गुरु का पाया साया
अनुभव के नूतन रत्न बटोरे स्नेहिल वरदहस्त की छाया
शांत सुधाकर शुक्ल पक्ष ज्यों बढ़ती चढ़ती रही कलाएं।।

महर भरी मुस्कान तुम्हारी भर देती प्राणों में स्पंदन
भ्रांत क्लांत उत्तप्त ह्नदय भी बन जाता शीतल चंदन
खुशियों के इन पुण्य क्षणों में गीत सुनाए दशों दिशाएं।।

हे महासूर्य! तेरी किरणों से आलोकित है पुण्य घरा
युग-युग तेरे संरक्षण में चमन रहे यह हरा भरा
अमर रहे गुरु आसन शासन सौगातों का थाल सजाएं।।