मोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही जीवन का लक्ष्य हो : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

मोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही जीवन का लक्ष्य हो : आचार्यश्री महाश्रमण

बीदासर, 10 फरवरी, 2022
धर्मोपदेशक आचार्यश्री महाश्रमण जी ने वीरभूमि, बीदासर में मंगल देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि धार्मिक जगत में मोक्ष-निर्वाण का बहुत ही महत्त्व है। प्रश्‍न आता है कि जीवन क्यों जीएँ? लक्ष्य उद्देश्य क्या होना चाहिए, जीवन जीने का? जीवन का लक्ष्य होना चाहिएमोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ना। भौतिक लक्ष्य यदि पैसा कमाना है, तो वो इस जीवन तक साथ रह सकता है, वो तो आगे जाने वाला नहीं। और भी भौतिक लक्ष्य हो सकते हैं, पर वे सब नश्‍वर हैं, उनका लक्ष्य इस जीवन तक ही है, कोई बड़ा लक्ष्य नहीं है। मोक्ष ऐसी चीज है कि वो मिल जाएँ, फिर वापस कभी वो नष्ट नहीं होता, हमेशा वहाँ रह सकते हैं। क्या इस जीवन के बाद मोक्ष मिल जाएगा? यह तो कठिन है। मोक्ष के निकट हो सकते हैं। जन्म सीमित हो गए ये भी बड़ी बात है। इस जीवन की साधना से मोक्ष के निकट हो सकेंगे, फिर अगले जन्म में और साधना कर सकते हैं। मोक्ष के लिए अनेक जन्मों में साधना करनी पड़ सकती है। हम भगवान महावीर के पूर्व भवों को देखें। कितने जन्मों तक साधना की। आखिर वर्धमान के भव में साधना कर मोक्ष पधारे। मोक्ष सही साधना से मिलता है। साध्य, साधन, साधना, साधु और सिद्धि ये पाँच शब्द हैं। छठा शब्द है, सिद्ध। साध्य मोक्ष है, साधन हैसम्यग् दर्शन, ज्ञान, चारित्र। साधना-साधन है, इनकी आराधना करो। जो ये साधना के करे वो जीव आदमी साधु है। सम्यग् साध्य की सम्यग् साधना करने से सिद्धि प्राप्त हो सकेगी। जिसको सिद्धि मिल जाएगी वो सिद्ध हो जाएगा। 


मोक्ष प्राप्ति के बाधक तत्त्व हैंचंडता, आवेश, गुस्सा। गुस्सा एक प्रकार की हार है। क्षमा करो, सहन करो। एक-एक श्‍वास को शांति से जीएँ। महान वह है, जो क्रोध रूपी विष को पीना जानता है। आने वाली हर साँस को जीना जानता है। बातों में माहिर बहुत मिलेंगे दुनिया में, सम्मान वह पाता है, जो समर बेला में सीना तानता है।
हर श्‍वास हमारी शुभ योग में बीते। चंडता आ जाए तो लंबे श्‍वास या मौन का प्रयोग करें। गालियों को सहन करना बड़ा काम है। किसी भी बात का अहंकार-घमंड नहीं करनी चाहिए। चुगली करने से बचें। बिना सोचे-विचारे काम नहीं करना चाहिए। आज्ञा-अनुशासन के अंदर रहें। आत्मानुशासन में रहने का प्रयास करें। धर्म का अबोध भी मोक्ष में बाधक है। व्यवहार में विनय भाव हो। मोक्ष के बाधक तत्त्वों से हम बचें और साधक-तत्त्वों का हम आसेवन-आराधना करें, तो मोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हम दूसरों के कल्याण में जितना हो सके सहायक बनने का प्रयास करें। स्वयं भी मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ें। पूज्यप्रवर की अभिवंदना में मुनि आदित्य कुमार जी, साध्वी संगीतश्रीजी ने अपनी भावना अभिव्यक्‍त की। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।