आत्मा के आसपास

स्वाध्याय

आत्मा के आसपास

आचार्य तुलसी

प्रेक्षा : अनुप्रेक्षा

अंतर्यात्रा

(क्रमश:) प्रश्‍न हो सकता है कि चित्त ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर कैसे जाता है? रक्‍तचाप मापने की मशीन में क्या होता है? पारा नीचे से ऊपर जाता है और ऊपर से नीचे आता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक पारा अपने स्थान से इधर-उधर नहीं होता। पारे की भाँति हमारी प्राण-ऊर्जा भी जब केंद्रीय नाड़ी-संस्थान अर्थात् सुषुम्ना में प्रवाहित रहती है, मस्तिष्क में पहुँच जाती है। किंतु चित्त जब तक बाह्य जगत से नहीं हटता है, पृष्ठरज्जु में केंद्रित नहीं होता, वह ऊर्जा का वाहक नहीं हो सकता। अंतर्यात्रा अभौतिक ऊर्जा के जागरण हेतु एक विशिष्ट यात्रा है, चेतना के आभ्यंतरीकरण की यात्रा है। इसका दीर्घकालीन अभ्यास साधक को स्वभाव की ओर उन्मुख करता है। और परभाव से पराङ्मुख करता है। जब तक परभाव के प्रति आकर्षण समाप्त नहीं होता, जीवन की दिशा नहीं बदल सकती। इसलिए परभाव का आकर्षण छोड़ना जरूरी है। यह आकर्षण छूटने पर ऊर्जा का प्रवाह अज हो जाता है। उसमें कहीं अवरोध नहीं आता। ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध समाप्त होने का अर्थ हैअध्यात्म का विकास, आनंद का विकास और सहजता का विकास। मानव-मन की यही तो अभीप्सा होती है। इसकी पूर्ति का सीधा-सा उपाय हैअंतर्यात्रा।

ध्यान से अहं-चेतना टूटती है या पुष्ट होती है?

दीर्घश्‍वास की साधना, चिरकालिक अभ्यास।
साधक को पल-पल रहे, अपना ही आभास॥
जागृत साक्षीभाव में, श्‍वास स्वयं है मंद।
गति-आगति को देखना, प्रेक्षा का निस्यन्द॥
चलते सोते बैठते, करते काम प्रकाम।
प्रेक्षा केवल श्‍वास की, याद रहे हर याम॥
मानस की एकाग्रता, तन विकार से दूर।
क्षीण अहं की चेतना, क्रोध लोभ भी चूर॥
प्रश्‍न : ध्यान करने की इच्छा, अनुकूल वातावरण और ऊपर की पूरी तैयारी के बावजूद साधक का अपना मन उसके हाथ में नहीं रहता। ध्यान-स्थिति में बैठने पर भी मन में संकल्प-विकल्पों का उद्भव होता रहता है। इस मन को कहाँ टिकाया जा सकता है?
उत्तर : मन के दो काम हैंसोचना और देखना। सोच-विचार संकल्पों को उत्पन्‍न करते हैं और दर्शन चिंतन को रोकता है। ध्यान-काल में मन से सोचने के स्थान पर देखना शुरू कर दिया जाए तो मन के भटकन की समस्या स्वयं सुलझ सकती है। प्रश्‍न होगामन से किसे देखा जाए? सबसे पहले देखना चाहिए श्‍वास को। श्‍वास के सधे बिना आगे गति नहीं हो सकती। क्योंकि अधिकांश व्यक्‍ति छोटा श्‍वास लेते हैं। साधना की द‍ृष्टि से दीर्घश्‍वास का अभ्यास आवश्यक है। श्‍वास लंबा लेना और छोड़नायह प्राणायाम नहीं है। कोरा प्राणायाम ध्यान के लिए न तो जरूरी है और न अच्छा ही है। दीर्घश्‍वास का प्रयोग और साथ-साथ उसका अनुभव, आते-जाते श्‍वास का जागरूकता के साथ हर पल अनुभव करना मन को केंद्रित करने का सरलतम और अमोघ उपाय है।
प्रश्‍न : दीर्घश्‍वास और प्राणायाम में क्या अंतर है?
उत्तर : केवल दीर्घश्‍वास और प्राणायाम दो तत्त्व नहीं है। श्‍वास में जो रेचक, पूरक और कुंभक की स्थिति है, वह प्राणायाम ही है। किंतु चित्त को श्‍वास पर केंद्रित कर उसके प्रति जागरूक बनना प्राणायाम नहीं, ध्यान है। श्‍वास की गति-अगति को देखना ध्यान है। केवल प्राणायाम का शारीरिक द‍ृष्टि से कोई उपयोग हो सकता है, पर मानसिक द‍ृष्टि से लाभ नहीं है, जबकि ध्यान से मानसिक विकास की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
दीर्घश्‍वास के प्रयोग अर्थात गति-आगति के अनुभव से तीन बातें फलित होती हैंजागरूकता, साक्षीभाव और श्‍वास की मंदता। साधना के प्रारंभ में इन तीन बातों की अनुभूति साधक के मन में आत्म-विश्‍वास जगा देती है। अपने प्रति विश्‍वास जगने का अर्थ है अपनी शक्‍तियों का बोध और उनके उपयोग की क्षमता। दीर्घश्‍वास प्रेक्षा का यह प्रथम निस्यन्द है, पहला रसाव है, जिसका अनुभव होने के बाद व्यक्‍ति की दिशा बदल जाती है। वह आत्मकेंद्रित बन जाता है और अपनी पहचान बना लेता है। श्‍वास-पे्रक्षा का अभ्यास जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे सहज जागरूकता की स्थिति निर्मित हो जाती हैं यह स्थिति दीर्घकालिक बनती है और भावक्रिया का विकास होने लगता है। फिर ठहरते, बैठते, चलते, सोते, काम करते हर क्रिया के साथ श्‍वास के प्रति जागरूकता बनी रहती है, उसकी सतत स्मृति बनी रहती है। इसमें कुछ करना नहीं पड़ता, केवल साक्षीभाव जगाना होता है। जाग्रत साक्षीभाव अपने प्रति ईमानदारी से सोचने-समझने की द‍ृष्टि देता है और राग-द्वेष की चेतना को दुर्बल बनाता है।
प्रश्‍न : दीर्घश्‍वास-प्रेक्षा, जागरूकता या साक्षीभाव का लाभ क्या है?
उत्तर : निरंतर नियमित रूप से निष्ठापूर्वक दीर्घकाल तक श्‍वास-प्रेक्षा करने से साधक कुछ विशिष्ट प्रकार के लाभों से लाभान्वित होता है। इससे मानसिक एकाग्रता बहुत अच्छी सध जाती है। शारीरिक द‍ृष्टि से बीमारियों को दूर करने में भी इसका उपयोग है। दीर्घश्‍वास और जागरूकता के योग से मन के विकार भी काफी मात्रा में बाहर निकल जाते हैं। अध्यात्म की द‍ृष्टि से जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण लाभ है, वह है अहं-चेतना की क्षीणता। सामान्यत: हर व्यक्‍ति में अहं की चेतना होती है, अस्मिता होती है। कुछ ऐसे निमित्तों का योग होता है, जिससे अस्मिता बढ़ती जाती है। एक सीमा के बाद उससे व्यक्‍तित्व खोखला हो जाता है और भीतर-ही-भीतर व्यक्‍ति टूटन का अनुभव करता है। वह समझने लगता है कि उसका अहंभाव उसे खा रहा है, फिर भी वह उसको छोड़ नहीं सकता। ऐसी स्थिति में दीर्घश्‍वास-प्रेक्षा का जागरूकतापूर्वक प्रयोग करने वाला साधक अपनी अहं-चेतना को क्षीण करने में सफल हो जाता है। अहं टूटता है तो उसके साथ क्रोध और लोभ भी समाप्त होने लगते हैं। क्रोध और लोभ ये दोनों ही ऐसे भाव हैं, जो वैयक्‍तिक और सामूहिक जीवन का संतुलन तोड़ते हैं। ये जब समाप्त होने लगते हैं तो व्यक्‍ति सहज रूप से शांत बन जाता है। (क्रमश:)