आत्मा के आसपास

स्वाध्याय

आत्मा के आसपास

आचार्य तुलसी

प्रेक्षा : अनुप्रेक्षा

शिविर साधना

बदली स्थिति, अब है कहाँ सुंदर गुरुकुलवास?
आंशिक पूरक बन सके, शिविरों का आवास॥
चलती है यह प्रक्रिया, वैसे विविध प्रकार।
भिन्‍न-भिन्‍न उद्देश्य हैं, भिन्‍न-भिन्‍न आधार॥
जागृति-मूलक जै-वि-भा नीडं का आयास।
शिविरों की आयोजना होती यथावकाश॥
दशान्हिकी साप्ताहिकी शिविर-साधना शांत।
लाभान्वित निश्‍चित रहे शिविरार्थी विश्रांत॥

प्रश्‍न: गुरुकुलवास की परंपरा अब समाप्त हो चुकी है, पर गुरुकुलों में जिस प्रकार व्यक्‍तित्व का निर्माण होता था, उसकी अपेक्षा आज भी अनुभव की जा रही है। इस स्थिति में हमारे सामने कोई ऐसा दूसरा विकल्प भी है, जो गुरुकुल-परंपरा की पूर्ति कर सके?
उत्तर : गुरुकुलवास की पद्धति अब बदल चुकी है। आज की विचारधारा में वह मान्य भी नहीं है। आज स्वतंत्रता को नए रूप में परिभाषित किया गया है। अनुशासन संबंधी प्राचीन मानदंड अब बदल गए हैं। गुरु और अनुशासन के लिए पुराने समय में जो गौरव था, वह क्षीण होता जा रहा है। वर्षों तक गुरुकुल में साधना करने की बात भी अब कठिन प्रतीत हो रही है। क्योंकि गुरुकुल की अपनी मर्यादाएँ होती हैं। गुरुकुल में रहने वाले को उन मर्यादाओं का हृदय से पालन करना होता है। मर्यादा के पालन में हार्दिकता न हो तो वह बहुत भारी प्रतीत होने लगती है। इस द‍ृष्टि से वर्तमान में गुरुकुल-व्यवस्था की उपयोगिता के आगे एक प्रश्‍नचि लग गया है। आज गुरुकुल-परंपरा का दूसरा विकल्प हैशिविर-साधना। शिविर इस युग की नई पद्धति है। इन्हें गुरुकुल-पद्धति का पूरक कहा जा सकता है। आजकल शिविरों की समायोजना बहुत होती है। शिक्षा, साधना, चिकित्सा और मनोरंजन आदि क्षेत्रों में शिविरों के प्रयोग हो रहे हैं। यद्यपि प्रत्येक क्षेत्र का शिविर अपनी भूमिका पर होता है। हर शिविर का उद्देश्य भिन्‍न होता है। उद्देश्य की भिन्‍नता में परिणाम की भिन्‍नता स्वाभाविक ही है। फिर भी शिविरों के प्रयोग एक द‍ृष्टि से काफी सफल हो रहे हैं।
जैन विश्‍व भारती एक विशिष्ट संस्थान है। वहाँ शिक्षा, साधना और सेवाइन तीनों क्षेत्रों में विशेष प्रयोग किए जा रहे हैं। इन प्रयोगों को व्यवस्थित रूप देने के लिए जैन विश्‍व भारती समय-समय पर शिविरों का आयोजन करती है। जैन विश्‍व भारती का साधना केंद्र (तुलसी अध्यात्म नीडम्) इस कार्य के प्रति सजग है। नीडम् के कार्यकर्ता शिविर की पूरी व्यवस्था करते हैं। वे चाहते हैं कि अध्यात्म का जो अज्ञात ोत यहाँ खुला है, उससे व्यक्‍ति लाभान्वित हो। पानी के अभाव में व्यक्‍ति प्यासा रहे, यह बात समझ में आने वाली है। पर जल के बीच रहकर भी कोई व्यक्‍ति प्यास से व्याकुल होता रहे, यह बात समझ में नहीं आती। कबीरजी ने भी इस तथ्य के साथ असहमति प्रकट करते हुए कह दिया‘पानी में मीन पियासी, मोए सुण-सुण आवै हाँसी।’
दिन-रात पानी में रहने वाली मछली प्यासी रहती है, इस बात पर हँसने वाले कबीर ने आगे चलकर लिख दिया‘यह सब आत्मज्ञान के अभाव में होता है।’ मनुष्य के सामने जितनी भटकन है, जितना विपर्यास है, वह सब आत्म-विमुखता की स्थिति में ही हो सकता है। आत्मोन्मुख व्यक्‍ति प्रेक्षाध्यान के प्रयोग से अपने स्वभाव को बदल लेता है, अपने व्यक्‍तित्व का रूपांतरण कर लेता है। स्वभाव-परिवर्तन या व्यक्‍तित्व-परिवर्तन की घटनाएँ शिविर-साधकों के जीवन में घटित हो जाती है। वहाँ साधना कर कई व्यक्‍ति-व्यसन-मुक्‍त हो जाते हैं। शराब और धूम्रपान जैसी बुराइयों को व्यक्‍ति फैशन के रूप में मान्यता दे देता है। फिर वह इनके चंगुल में इतना फँस जाता है कि चाहने पर भी मुक्‍त नहीं हो सकता। प्रेक्षाध्यान के शिविर लेने वाले व्यक्‍ति अंत:करण की प्रेरणा और वातावरण के प्रभाव से असंभव को संभव बनाकर दिखा देते हैं। वे तनाव का विसर्जन करने में सफल हो जाते हैं और शांतिपूर्ण जीवन जीने की तकनीक प्राप्त कर लेते हैं। जब तक ध्यान के द्वारा अंतर्मुखता की स्थिति पुष्ट नहीं होती है, स्वभाव-परिवर्तन की कल्पना साकार नहीं हो सकती। इस द‍ृष्टि से ध्यान शिविरों में प्रशिक्षण प्राप्त कर उसका प्रयोग करने की अपेक्षा सदा बनी रहती है।
प्रश्‍न : प्रेक्षाध्यान का मूलभूत उद्देश्य क्या है? इसकी साधना करने वाला किस दिशा में, किस सीमा तक गति कर सकता है।
उत्तर : प्रेक्षाध्यान का मुख्य उद्देश्य हैजीवन में धर्म का प्रयोग। आज धर्म शक्‍ति-शून्य-सा प्रतीत हो रहा है, उसका कारण यही है कि धार्मिक लोगों के जीवन में धर्म का कोई प्रायोगिक रूप नहीं रहा। प्रयोग के बिना धर्म जीवन को भावित नहीं कर सकता। धर्म को प्रयोग की भूमिका पर उतारने के लिए ध्यान का अभ्यास जरूरी है। ‘इसिभासियं’ में कहा गया है कि ध्यान-शून्य धर्म बिना सिर का शरीर है। ध्यान धर्म का प्रायोगिक रूप है। ध्यान के अभ्यास से धर्म जीवन में उतरता है। जब तक ध्यान की गहराई में प्रवेश नहीं होता, धर्म के रहस्य खुल नहीं सकते। धर्म अपने आपमें एक रहस्य है। वह तब तक अधिगत नहीं हो सकता, जब तक ऊपर-ऊपर से धर्म का स्पर्श किया जाए।
(क्रमश:)